तूफां कर रहा था…

हजार योजने प्रवास…. स्थलकालाचा, मनोविश्वाचा.. आणखी फक्त दिडेक महिना आणि या Land of Freedom and Beacon of Hope ला कायमचा रामराम. जननी जन्मभूमीकडे प्रयाण. कालच एक दोनेकशे वर्ष जुनी पाण्यावर चालणारी चक्की, शेतीची साधने आणि इतर यांत्रिक अवजारे पहायला एका ठिकाणी गेलो होतो. येताना मित्राने शेर ऐकवला… कधी कधी गोष्टी घडून जातात आणि मग सार्थकता जाणवते. घरी आल्यावर शेर मनात घोळत राहिला आणि आज तर नुसता छळून राहिला…. अर्ज है –

तूफां कर रहा था मेरे अज्म की तवाफ़, दुनियावालोंको लगा की कश्ती तूफां में है…!

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फ़ैज़

निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

है अहल-ए-दिल के लिये अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद

बहोत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिये
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें, किस से मुंसिफ़ी चाहें

मगर गुज़रनेवालों के दिन गुज़रते हैं
तेरे फ़िराक़ में यूँ सुबह-ओ-शाम करते हैं

बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी मांग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हमने जाना है
कि अब सहर तेरे रुख़ पर बिखर गई होगी

ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दिवार-ओ-दर में जीते हैं

यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तेरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते

ग़र आज तुझसे जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
ग़र आज औज पे है ताल-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं

जो तुझसे अह्द-ए-वफ़ा उस्तवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-निहार रखते हैं

Unending Love

Recently, I happen to watch couple of Audrey Hepburn movies. I had watched Roman Holiday and ‘Ti Fulrani’ fame My Fair Lady long time ago but never forgot that pale and delicate demeanor of her. Watching Breakfast at Tiffany’s was again the same experience relived.

When she died, living a life which one can only imagine, Gregory Peck, a companion of her recited her favourite poem on camera, penned by Rabindranath Tagore, titled Unending Love. Here goes that mysterious poem –

I seem to have loved you in numberless forms, numberless times…
In life after life, in age after age, forever.
My spellbound heart has made and remade the necklace of songs,
That you take as a gift, wear round your neck in your many forms,
In life after life, in age after age, forever.

Whenever I hear old chronicles of love, it’s age old pain,
It’s ancient tale of being apart or together.
As I stare on and on into the past, in the end you emerge,
Clad in the light of a pole-star, piercing the darkness of time.
You become an image of what is remembered forever.

You and I have floated here on the stream that brings from the fount.
At the heart of time, love of one for another.
We have played along side millions of lovers,
Shared in the same shy sweetness of meeting,
the distressful tears of farewell,
Old love but in shapes that renew and renew forever.

Today it is heaped at your feet, it has found its end in you
The love of all man’s days both past and forever:
Universal joy, universal sorrow, universal life.
The memories of all loves merging with this one love of ours –
And the songs of every poet past and forever.

बोरकर, बोरकर, बोरकर

निळ्या खाडीच्या काठाला माझा हिरवाच गाव.
जगात मी मिरवितो त्याचे लावुनिया नाव !

पूल ओलांडिता पुढे रस्ता येईल तांबडा.
घरी आणील सरळ जरी दिसला वाकडा.

माणसांच्या जागीसाठी दाटी करितात माड.
गर्द मधेच एखादे आंब्या फणसाचे झाड.

असो झाडी किंवा वाडीसुने नाही वाटायचे.
नादी आपुल्याच कोणी तेथे गात असायचे.

थोडया पायवाटा हिंडा लालतांबडया वाकडया.
होडया उपडया झालेल्या तशा बघाल टेकडया.

जेथे होईल माध्यान्ह तेथे पान वाढलेले.
काळोखात कुणीतरी ज्योत घेउन आलेले.

गोव्यतला माझा गाव असा ओव्यांतच गावा.
तेथे जावून राहून डोळे भरून पाहावा.

जनाब फैजल शाह साहब

आदाब. शोमा खूब हास्तिद? मन खुबम.

बड़े दिन बाद अच्छा, कुछ खास सुनने मिला. जनाब फैजल शाह, जिन्होंने आय.ए.एस. में पिछले साल अव्वल नंबर लाया उनके कुछ अलफ़ाज़ मै यहाँ आपके सामने पेशे-ए-ख़िदमत करना चाहूँगा. आप वैसे तो कश्मिरसे है और पेशेसे डॉक्टर है. लेकिन आपने उर्दू लिटरेचर लेकर आय.ए.एस. में टॉप किया. एक मुसलमान और एक कश्मीरी होना बिलकुल इसके आड़े नहीं आया. जहा काबिलीयत और जुनून है वहा मंज़र तक पहुँचाना सिर्फ कुछ अर्से का सवाल है इसकी आप एक मिसाल हो. आप अल्लामा इकबालके बड़े कायल हो. जिस लताफ़त से इक़बाल के सुखन आपके ज़हनसे निकलकर जमुरियापर बरस पड़ते है उसे देखकर तो हमारे रोंगटे खड़े हो गए.

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
तही ज़िन्दगी से नहीं ये फ़ज़ायें यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं
क़ना’अत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर चमन और भी, आशियाँ और भी हैं
अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तेरे सामने आसमाँ और भी हैं
इसी रोज़-ओ-शब में उलझ कर न रह जा के तेरे ज़मीन-ओ-मकाँ और भी हैं
गए दिन के तन्हा था मैं अंजुमन में यहाँ अब मेरे राज़दाँ और भी हैं

हाज़िर है उनके हर्फ़ उनिके आवाज में जो आपमे गालिबन नार-ए-ज़ज्बात पैदा करेंगे –