अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चाँद और तारे,
उठा तूफ़ान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे

मगर इस रात में भी लौ लगाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

… गगन में गर्व से उठ उठ
गगन में गर्व से घिर घिर,
गरज कहती घटाए हैं
नहीं होगा उजाला फिर

मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

तिमिर के राज्य का ऐसा
कठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे
उन्होंने सिर झुकाया है

मगर विद्रोह की ज्वाला जलाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रलय का सब समां बांधे
प्रलय की रात है छाई
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आयी

मगर निर्माण में आशा दृढआये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रभंजक मेघ दामिनी ने
न क्या तोडा न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच
कुछ साबुत नहीं छोड़ा

मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रलय की रात को सोचे
प्रणय की बात क्या कोई
मगर प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोई

किसी के पंथ में पलकें बिछाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

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One thought on “अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

  1. श्रद्धा भोवड

    हरिवंशराय बच्चन.
    ’मधुशाला’ वाचल्याच्या भांडवलावर मी जास्त काही बोलणार नाही पण फ़ार सरळ, सोप्पं, भिडणारं लिहीलंय त्यांनी?
    तू नरेश मेहतांच्या कविता वाचल्या आहेत का? माझ्या एका मित्राकरवी माझ्याकडे आलेली ही कविता- अशीच साधी, सरळ पण आशयगर्भ.

    इतिहास किसी भाषा का नाम नहीं,
    और न ही किसी उदात्त मानवी संबंध का नाम।
    वो तो शक्ति के लिए किया गया नितांत अमानुष रक्तस्नान है।

    समर्पण का एक ऐसा विचार फूल वनस्पती कि स्वाहा वाणी है।
    प्रार्थना मनुष्यकी –
    इसलिए प्रतिइतिहास हो जानेका नाम नहीं,
    बल्की इतिहाससे सर्वथा उदासीन होकर वनस्पती हो जानेका नाम प्रार्थना है।

    समुद्र जब आकाश के प्रति आकर्षित होता है
    तो प्रतिआकाश नहीं – मेघ बनना होता है।

    सूर्य जब पृथ्वी के लिए आकुल होता है
    तब प्रतिपृथ्वी नहीं धूप बनना होता है।

    पर्वत जब यात्रा के लिए व्याकुल होता है
    तो प्रतियात्रा नहीं नदी बनना होता है।

    येह मेघ यह धूप ये नदीयां इतिहास नहीं – प्रार्थनाएं है।

    इतिहास का उत्तर प्रतिइतिहास कभी नहीं होता –
    क्योंकी दोनों भी एक दूसरेकी तलाश है!

    एक प्रश्न है – तो दूसरा केवल प्रतिप्रश्न।

    उत्तर ही नहीं….

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