और सबमें जो बुरा है सो है वो भी आदमी

अन्ना हजारे जी का आमरण उपोषण आखिरमें कुछ तो दे गया… किसके खिलाफ था और किनके लीये था, गर थोडा सोचेंगे तो समझ आये भला….
कई सदी पहले एक उर्दू शायर हुआ करता था… बात उस ज़माने की है जब उर्दू हिंदी मानो जैसे गंगा जमुना थी. वैसे तो मुग़लिया सल्तनतमें अच्छे अच्छे शायरोंकी बड़ी रिवायत है. लेकिन इन्होने जो देखा शायद ही दुनिया में कोई और उसे देखा पाया. खैर. इनका नाम है नजीर अकबराबादी. अब ना वो उर्दू रही ना वो अकबराबाद. उर्दू के दो टुकड़े है और अकबराबाद को इस ज़माने में आगरा कहा जाता है. तो अन्ना हजारे का अनशन देखते देखते नजीर साहब की एक नज्म याद आयी. फ़र्ज़ है…

दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी, और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी,
ज़रदार बेनवा है सो है वो भी आदमी, निअमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी

मसज़‍िद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ, बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्‍वाँ
पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां, और आदमी ही चुराते हैं उनकी जूतियाँ
जो उनको ताड़ता है सो है वो भी आदमी

यां आदमी पै जान को वारे है आदमी, और आदमी पै तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी को उतारे है आदमी, चिल्‍ला को पुकारे आदमी को है आदमी
और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी

अशराफ़ और कमीने से शाह ता वज़ीर, ये आदमी ही करते हैं सब कारे दिलपज़ीर
यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर, अच्‍छा भी आदमी कहाता है ए नज़ीर
और सबमें जो बुरा है सो है वो भी आदमी

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