वो जो हममे तुममे करार था..

मोमीन खान मोमीन साहेबांची उत्कृष्ट गजल…
वो जो हममे तुममे करार था.. तुम्हे याद हो के न याद हो….
वो नये गिले वो शिकायते, वो मजेमजेकी हिकायते…वो हर एक बातपे रूठना… तुम्हे याद हो के न याद हो…

बघा एकेकाने कशी गायली आहे..

नय्यर नूर –

गुलाम अली –

फरीदा खानुम –

बेगम अख्तरीबाई फैजाबादी-

अबिदा परवीन –

पंकज उदास –

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3 thoughts on “वो जो हममे तुममे करार था..

  1. Mayuresh Sawant

    वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो|
    वही यानी वादा निभा का तुम्हें याद हो के न याद हो|

    वो नये गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें,
    वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के न याद हो|

    कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी,
    तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो|

    सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का,
    वो निभाने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो|

    कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी,
    कभी हम भी तुम भी थे आश्ना, तुम्हें याद हो के न याद हो|

    हुए इत्तेफ़ाक़ से गर बहम, वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम,
    गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा, तुम्हें याद हो के न याद हो|

    वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेश्तर, वो करम के हाथ मेरे हाथ पर,
    मुझे सब हैं याद ज़रा ज़रा, तुम्हें याद नो कि न याद हो|

    कभी बैठे सब हैं जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू,
    वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो|

    वो बिगड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का,
    वो नहीं नहीं की हर आन अदा, तुम्हें याद हो कि न याद हो|

    जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बावफ़ा,
    मैं वही हूँ “मोमिन”-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो|

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