वो जो हममे तुममे करार था..
by Nikhil Sheth
मोमीन खान मोमीन साहेबांची उत्कृष्ट गजल…
वो जो हममे तुममे करार था.. तुम्हे याद हो के न याद हो….
वो नये गिले वो शिकायते, वो मजेमजेकी हिकायते…वो हर एक बातपे रूठना… तुम्हे याद हो के न याद हो…
बघा एकेकाने कशी गायली आहे..
नय्यर नूर -
गुलाम अली -
फरीदा खानुम -
बेगम अख्तरीबाई फैजाबादी-
अबिदा परवीन -
पंकज उदास -
वा वा, फारच सुंदर पण मला गुलाम अली अन् बेगम अख्तर ची चालच आवडते.
arey..majhya khoop priy gazal chi athvan kadhlis.
Jise aap ginte the ashana jise ap kehte the baavafa
Main wohi hoon, momin e mukhtila, tumhe yaad ho ke na yaad ho.
Wah wah. Thanks…
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो|
वही यानी वादा निभा का तुम्हें याद हो के न याद हो|
वो नये गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें,
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के न याद हो|
कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी,
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो|
सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का,
वो निभाने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो|
कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी,
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना, तुम्हें याद हो के न याद हो|
हुए इत्तेफ़ाक़ से गर बहम, वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम,
गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा, तुम्हें याद हो के न याद हो|
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेश्तर, वो करम के हाथ मेरे हाथ पर,
मुझे सब हैं याद ज़रा ज़रा, तुम्हें याद नो कि न याद हो|
कभी बैठे सब हैं जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू,
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो|
वो बिगड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का,
वो नहीं नहीं की हर आन अदा, तुम्हें याद हो कि न याद हो|
जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बावफ़ा,
मैं वही हूँ “मोमिन”-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो|